गत सप्ताह मेरी मुलाकात मेरे एक दोस्त रमेश से हुई जो एक तेजी से उभरती हुई एफएमसीजी कंपनी में मार्केटिंग हेड है। वह काफी तनाव में था और अपनी नौकरी बदलने की योजना बना रहा था। उसकी मुख्य चिंता वित्त को लेकर थी और उसने मुझसे इस बारे में चर्चा भी की। मैं यह जानकर हैरान था कि अच्छी-खासी सैलरी होने के बावजूद वह आर्थिक समस्या से जूझ रहा है। दो घंटे की चर्चा के पश्चात मैं इस नतीजे पर पहुंचा की उसकी समस्या सैलरी नहीं है बल्की उसका सही तरीके से प्रबंधन नहीं करना है। इस चर्चा के दौरान मैने कुछ बिंदुओं पर गौर किया और वह मैं आपसे शेयर करना चाहता हूं ताकि रमेश जैसे अन्य व्यक्ति अपने आर्थिक जीवन को और अधिक बेहतर बना सके। कृपया इस बात का ध्यान रखें कि इसकी तुलना फाइनेंशियल प्लानिंग से नहीं की जा सकती है लेकिन यह आपकी वित्तीय समस्याओं को हल करने में सहायक अवश्य साबित हो सकता है।
1) अपने ईपीएफ से ना करें छेड-छाड़
जब कभी भी कोई व्यक्ति अपनी नौकरी बदलता है तो या तो वह अपना ईपीएफ का भुगतान करवा लेता है या फिर उसे भूल जाता है। और उससे भी बड़ी भूल तब करता है जब वह ईपीएफ की राशि का उपयोग अपने अन्य खर्चों के रूप में कर लेता है। किसी संगठित क्षेत्र में ईपीएफ में सहयोग देना अनिवार्य तो होता ही है लेकिन यह सुरक्षित बचत का सबसे बेेेहतर साधन होता है। रिटायरमेंट के पश्चात यह किसी कर्मचारी के लिए सबसे अच्छा आर्थिक सहारा साबित होता है। ईपीएफ में सबसे बेहतर बात यह होती है कि इस फंड में जितना योगदान कर्मचारी करता है उतना ही योगदान नियोक्ता के द्वारा किया जाता है। माना की आपकी रिटायरमेंट की उम्र अभी काफी दूर है लेकिन आपको यह ध्यान रखना चाहिए की रिटायरमेंट के पश्चात जब आपके पास आय का कोई साधन नहीं होगा तब ईपीएफ राशि ही आपका सहारा होगी।
ईपीएफ लेन-देन के तीन प्रमुख प्रभाव
टैक्स पर प्रभाव : यदि आप अपनी नौकरी प्रारंभ करने के ५ साल के अंदर अपने ईपीएफ की रकम को निकाल लेते है ंतो वह सारी रकम जो अब तक कर से मुक्त थी, कर के दायरे में आ जाएगी और उस पर सरकार की तरफ से मिलने वाला ब्याज भी समाप्त हो जाएगा।
निष्क्रीय खाते : यदि आपने अपनी पूर्व नौकरी के ईपीएफ फंड का स्थानांतरण नहीं कराया है और यदि तीन साल तक उस खाते में आपके पूर्व नियोक्ता द्वारा कोई राशि जमा नहीं कराई गई है तो आपका वह ईपीएफ खाता निष्क्रिय खाते की श्रेणी में तब्दील हो जाएगा व सरकार उस पर ब्याज देना बंद कर देगी।
रिटायरमेंट की बचत पर नकारात्मक प्रभाव : इसे समझने के लिए हम एक उदाहरण लेते हैं। २५ साल के श्रीमान एक्स जो हाल ही में नौकरी पर लगे हैं और वे अपने ईपीएफ में ५००० रुपये प्रति माह का योगदान दे रहे हैं। ईपीएफ पर ब्याज दर ८.५ प्रतिशत है और उनके योगदान से यह बढ़कर १० प्रतिशत सालाना हो जाएगा। यदि वह ६० साल की उम्र तक लगातार ईपीएफ में योगदान देते रहते हैं तो उनका ईपीएफ बैलेंस ८.५७ करोड़ रुपये हो जाएगा। पर यदि वह ऐसा नहीं कर पाते और किसी कारणवश ३५ साल की उम्र में ईपीएफ का पैसा निकाल लेते हंै तब उन्हें ६.५२ करोड़ रुपए प्राप्त होंगे जिसमें उनका योगदान उस समय तक २५,९०० रुपये प्रतिमाह का होगा। अर्थात थोड़े से कुप्रबंधन की वजह से उन्हें २ करोड़ रुपये का नुकसान हो जाएगा।
जब भी आप अपनी नौकरी बदलें अपना ईपीएफ खाते का स्थानांतरण अवश्य करवाएं। जिससे यह सक्रिय रहेगा व उस पर ब्याज मिलता रहेगा। यह आपके रिटायरमेंंट बचत के लिए अति आवश्यक है।
जोखिम प्रबंधन
सामान्यत: विभिन्न कंपनियां अपने कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए कई प्रकार के उपाय करती है जैसे ग्रुप मेडिक्लेम, ग्रुप एक्सीडेंट पॉलिसी आदि जिससे कर्मचारियों में ऑल इज वेल की भावना रहती है। लेकिन क्या कभी आपने इसके गहराई से अध्ययन किया है। यहां नियोक्ता ने अपनी देनदारी को कवर किया है न की आपकी जिम्मेदारी को। एक बार जब आप अपनी नौकरी छोड़ देते हैं या रिटायर हो जाते है तब नियोक्ता की जवाबदेही समाप्त हो जाती है लेकिन आपकी जिम्मेदारी फिर भी बरकरार रहती है। इस प्रकार की पॉलिसियों में भी अधिकांशत: उन्ही दुर्घटनाओं को कवर किया जाता है जो ऑफिस के कार्यकाल के समय घटित हुई हो।
इसका तात्पर्य यह हुआ की जब आप ऑफिस का कार्य नहीं कर रहें हो अर्थात आप अवकाश पर हो, या ऑफिस की छुट्टी हो या ऑफिस का समय समाप्त होने पर कोई घटना घटती है तो उस स्थिति में नियोक्ता द्वारा प्रदान की गई पॉलिसी से कोई सहायता प्राप्त नहीं होगी। बीमा पॉलिसियों का कवर क्षेत्र बढ़ाने के लिए नियोक्ता को अधिक पैसा खर्च करना पड़ता है इसी कारण वह कम पैसे वाली पॉलिसियों का चुनाव करता है। हाल के दिनों में यह चलन भी देखने को मिल रहा है कि कुछ नियोक्ता अपने कर्मचारियों को यह ऑफर दे रहें है कि यदि वे विभिन्न पॉलिसियों का दायरा बढ़ाना चाहते है तो इसके लिए उन्हें भी आर्थिक सहयोग देना होगा।
वर्तमान में जहां रोजगार की मारा-मारी व कर्मचारियों की स्थायित्वता का संशय बरकरार रहता है उस स्थिति में इस प्रकार की पॉलिसियां पर्सनल फायनेंस की श्रेणी में आती हैं। अत: इनका प्रबंधन बहुत सोच-समझकर व बेहतर ढंग से करना होगा।
क्या करें : अपने खतरों का अच्छी तरह से अध्ययन करें और अपनी आवश्यक्ता के अनुरूप ही पॉलिसियां अपने व अपने परिवार के लिए ले।
जीवन बीमा : अपनी आय का अध्ययन कर अपनी आय का कम से कम १० गुना राशि की जीवन बीमा पॉलिसी ले।
हेल्थ इंश्योरेंस : किसी बीमारी से ग्रसित होने के पशचात आपको स्वास्थ बीमा प्राप्त करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि कुछ कंपनियां वरिष्ठ नागरिकों के लिए कुछ स्वास्थ बीमा पॉलिसी पेश करती है लेकिन उनकी संख्या काफी कम है। इसलिए अपने व अपने परिवार के लिए एक बेहतर स्वास्थ बीमा पॉलिसी अभी से ले लेवें।
गंभीर बीमारी : यदि आप अपने नियोक्त द्वारा प्रदान की जाने वाली पॉलिसी पर पूरी तरह से निर्भर है तब इस प्रकार की पॉलिसी सिर्फ अस्पताल का खर्च वहन करती है दवाईयों का नहीं। यदि आप इस प्रकार की बीमारी से ग्रसित हो जाएं जिसमें आपको लंबे समय तक दवाईयों का सेवन करना पड़े उस स्थिति में आपकी कंपनी की पॉलिसी आपको कवर नहीं देगी। अत: समस्या से बचने के लिए एक बेहतर गंभीर बीमारी पॉलिसी अवश्य ले।
पर्सनल एक्सीडेंट पॉलिसी : अपनी आय से कम से कम १० गुना राशि वाली पर्सनल एक्सीडेंट पॉलिसी अवश्य लेनी चाहिए जिससे यदि भविष्य में कुछ दुर्घटना होती है तो आपको आर्थिक रूप से सहयोग प्राप्त होगा।
क्या आपकी कर योजना सही है :किसी भी कर्मचारी के लिए यह उसकी आर्थिक बचत का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। टैक्स सेविंग योजनाओं में निवेश कर कर्मचारी अपने टैक्स में कमी कर सकता है। देखने में यह आता है कि अधिकांश कर्मचारी जनवरी-मार्च के दौरान इस प्रकार की योजनाओं में निवेश करते है जिससे उन्हें विभिन्न दस्तावेजों को ऑफिस में जमा करने में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अत: इन समस्या से बचने के लिए निवेश पहले से कर लें। अंतिम क्षणों की हड़बड़ाहट में आपके कई निर्णय गलत हो सकते है। आपके पास बेहतर टैक्स सेविंग प्लान चुनने का समय नहीं होता है। आप अपने मित्र या किसी परिचित के कहने पर प्लान में निवेश कर देते है।
क्या करें : यदि आप उपरोक्त बातों में से प्रारंभ की दो बातें ईपीएफ व खतरों का प्रबंधन को बेहतर तरीके से लागू करतें हैं तो आपकी टैक्स की समस्या अपने आप हल हो जाती है, क्योंकि उन दोनों बातों में ही अधिकांश बातें समाहित है। हालांकि जल्दबाजी में निर्णय न लेते हुए किसी बेहतर कर सलाकार से सलाह लेवे व अपनी जरूरतों के अनुसार टैक्स सेविंग प्लान का चुनाव करें। बेहतर होगा की आप अपनी कर बचत की योजनाओं पर अप्रैल माह से ही कार्य आरंभ कर दे।
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